Generic और brandid medicine 💊 के बीच क्या अंतर है ?
- क्या जेनेरिक दवाएं ब्रांडिड दवाओं जितनी ही असरदार है
- जेनेरिक दवाओं को लेने के क्या फायदे है ?
- branded दवा के स्थान पर जेनरिक दवा क्यों लेनी चाहिए
- जेनेरिक दवाएं ज्यादा अच्छी है या ब्रांडेड दवाएं ?
- Generic दवाइयां कैसे बनती है ? ये इतनी सस्ती क्यों होती है
- दवा खरीदते समय कैसे पता करें की Generic दवा है या branded ?
- सबसे अधिक फ़ायदा Generic दवा करती है या Branded
Genric दवाएँ और Branded दवाओं में अंतर
जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं के समान रूप से प्रभावी होती हैं, क्योंकि वे उनके उत्पादित घटकों का समान मात्रा में होते हैं। ये दोनों ही उच्च मानकों के तहत निर्मित होते हैं |
ब्रांडेड दवाएं उन दवाओं को कहते हैं जो एक कंपनी द्वारा निर्मित और पहचानी गई होती हैं। इन दवाओं का नाम, डिज़ाइन, और उनकी पहचान किसी विशेष कंपनी से जुड़ा होता है, जिनका उनके विकास और प्रमोशन में योगदान होता है।
जेनेरिक दवाएं वे दवाइयाँ होती है जो किसी brand के नाम से नही बिकती हालाँकि उनकी विशिष्टता, उत्पादन, कांटेंट branded जैसा ही होता है । उन्हें किसी कम्पनी के नाम से नही पहचानी जाती ।
जेनेरिक दवाएँ सस्ती इसलिए होती हैं क्योंकि उनकी विक्रय में पूरे प्रक्रिया में कम खर्च होता है और वे कम प्रमोशन का उपयोग करती हैं। इसीलिए उनका मूल्य कम होता है।
क्या जेनरिक दवा branded दवा से कम असरदार है?
आज तक मैंने किसी भी मरीज को पूर्ण रूप से स्वस्थ होते नहीं देखा।कुछ ऐसे example है ।जिससे ये सिद्ध भी होता है की समय से पहले किसी भी बीमारी का इलाज नहीं है।अगर आप मेरी बात से सहमत न हो तो।दाद की कोई दवाई बता दे।बहुत मरीज आते है,बहुत दुःख होता है जब वो कहते है हजारो रूपए की दवाई ले ली अभी तक कोई आराम नहीं आया।
Doctors को भी क्या करे , किसी बीमारी के पूरी तरह ठीक होने की क्या गैरंटी है। फिर भी इलाज तो डॉक्टर ही करेगा।
सीधा सा मतलब यही है की जिसकी जितनी ऋण है उसे भगवान द्वारा बनवाए गए counter मतलब medical स्टोर पर जाकर अपनी किश्त चुकानी है।
जेनेरिक दवाएं ज्यादा अच्छी है या ब्रांडेड दवाएं ?
जेनेरिक दवाइयां ज्यादा अच्छी हैं या ब्रांडेड दवाइयां?
किसी भी दवा का असर करना उसके कैमिकल फॉर्मूले पर निर्भर करता है। दवा चाहे ब्रांडेड हो या जेनेरिक इनका कैमिकल फॉर्मूला एक ही होता है, इस हिसाब देखा जाये तो दवाओं में कोई अंतर नहीं होता।
अंतर होता है दवा की कीमत में, जेनेरिक दवाईयाँ अपना रूपया प्रचार करने में खर्च नहीं करतीं, जेनेरिक दवाई लिखने के बदले कंपनी डॉक्टरों को कमीशन नहीं देती, इसलिये जेनेरिक दवाईयाँ सस्ती होती हैं।
वहीं ब्रांडेड दवा कंपनियाँ करोड़ों रूपया दवा के प्रचार पर खर्च करतीं हैं। कंपनी की ओर से एजेंट डॉक्टर्स के पास जाते हैं कि आप अपने मरीजों को हमारी दवा लिखें और हमारी दवा प्रमोट करें हम आपको इतना % कमीशन देंगें। इस सबमें कंपनी का रूपया खर्च होता है, इसलिये ब्रांडेड़ दवाईयाँ महंगी होती हैं। और ज्यादातर डॉक्टर्स भी कमीशन के लालच में मरीजों को ब्रांडेड दवाईयाँ लिखते हैं।
For Example:
अब यदि किसी व्यक्ति की तबीयत खराब है, वो डॉक्टर के पास ही जाएगा, डॉक्टर उससे कहता है कि आप ठीक हो जायेगें आपको बस एक महीने तक हर रोज एक लीटर गाय का दूध पीना है।
अब गाय का दूध आपको कहीं भी 60 रूपये लीटर में मिल जायेगा। लेकिन अगर डॉक्टर कहे आप ठीक तभी होंगें जब आप दूधिया श्रवण की गाय का दूध पियेंगें, तो अब आप ठीक होने के लिये श्रवण की गाय का दूध ही खरीदेंगें फिर चाहे वो दूध 500 रूपये लीटर मिले।
दूध में कोई अंतर नहीं है, बस श्रवण को डॉक्टर प्रमोट कर रहा है , बदले में श्रवण डॉक्टर को कमीशन दे रहा है।
उम्मीद है आप समझ गये होंगें जेनेरिक दवाईयाँ सस्ती होने के बाद भी ब्रांडेड दवाओं जितनी ही अच्छी होतीं हैं। कहने का सीधा सा मतलब है, अपनी दवा के promotion के लिए कंपनी जो भी खर्चा करती है, उसका सारा भार custmer पर ही पड़ेगा। और ये सब जेनेरिक medicine में नही होता |
Generic दवाइयां कैसे बनती है ? ये इतनी सस्ती क्यों होती है ?
क्या ये दवाइयां असर करती है
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| Generic Madison |
सब मार्केटिंग का खेल है मार्केट में घूमने वाले एजेंट से लेकर एवं विज्ञापन से लेकर उन विज्ञापनों एजेंट अधिकारी कर्मचारियों में जो खर्च होता है वेतन भत्ते ट्रैवलिंग मैं वह सारा कुछ कंपनी ही तो उठा उठाती है और जब वह सारा खर्च निकालना है तो ब्रांडेड के नाम पर स्वाभाविक सी बात है उस दवा को महंगे दाम में भेजा जाएग लागत मूल्य की अपेक्षा कम से कम 20 गुना महंगे दाम में बेचा जाएगा ताकि कंपनी को भी मुनाफा और अपने कर्मचारियों को विज्ञापन के लिए कंपनी खर्च कर सके जबकि जेनेरिक दवाओं में उत्पादक से दवा सीधे मार्केट में आ जाती है बीच में कोई कर्मचारी ब्रांडिंग के लिए या विज्ञापन के लिए नहीं होते हैं इसीलिए यह अंतर होता है|
Must Read
हां ऐसा अक्सर सुनने में आया है कि ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं की गुणवत्ता जेनेरिक दवाओं से बेहतर होती है तो यह सब अपने अपने अनुभव की बातें होती हैं
जैनरिक दवाएं किसी भी ब्रांडेड दवा से कम नहीं होती है यह उतनी ही असरदार और कारगर होती हैं जितनी की ब्रांडेड दवा। जैनरीक दावा बिना किसी पेटेंट के बनाई जाती है। ये दवाईयां किसी भी ब्रांडेड दवाईयों से कम असरदार नहीं होती हैं। सभी जेनरिक दवाईयों के साइड इफेक्ट्स ब्रांडेड दवाईयों की तरह ही होते हैं। किसी भी दवा का जैनेरिक नाम पूरे विश्व में एक सा होता है। जैनेरिक दवाईयों का नाम उस औषधि में मौजूद सक्रिय घटक के आधार पर विशेषज्ञ समिति द्वारा निर्धारित किया जाता है।
जैसे : उच्छाई दुष्क्रिया( Ecrectile dysfunction) की चिकित्सा के लिए Sildenafil नामक जैनेरिक दवा है इसी दवा को फाइजर कंपनी व्याग्रा के नाम से बेचती है।
लोग Branded दवाइयों पर ज़्यादा भरोसा करते है
प्रत्येक शहर हो या क़स्बा इन जेनरिक दवाओं के लिए मेडिकल स्टोर उपलब्ध हैं, लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी और भ्रम के कारण वे इसका सही लाभ नहीं उठा पाते हैं। देश में जितनी भी दवा निर्माण करने वाली कंपनियाँ हैं, वे सभी ब्रांडेड दवाओं के साथ-साथ जेनरिक दवाएँ भी तैयार करती हैं। हालांकि, अधिक लाभ के लालच में डॉक्टर भी इन दवाओं को लिखने से कतराते हैं, जबकि ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं के बीच मूल्य का अंतर पांच से दस गुना तक हो सकता है।
Branded दवाइयाँ महगी क्यों होती है?
जैनरिक दवाईयों को बाजार में लाने के पूर्व इनकी गुणवत्ता मानकों की सभी एचडी प्रक्रियों से गुजरना पड़ता है। इन दवाईयों के प्रचार प्रसार के लिए कोई भी दवा कंपनी खर्चा नहीं करती है। इनके मूल्य निर्धारण में सरकार का अंकुश होता है। इस लिए जैनिरक दवाईयों सस्ती होती हैं। जबकि ब्रांडेड दवाईयों की कीमत इन्हे बनाने वाली कंपनी खुद निर्धारित करती है इस लिए ब्रांडेड दवाईया महंगी मिलती हैं।
जेनेरिक दवाइयाँ सस्ती क्यों होती है?
- जेनरिक दवाईयों में भी वही सॉल्ट होता है जो ब्रांडेड दवाईयों में होता है। जब ब्रांडेड दवाओं का सॉल्ट मिश्रण और उत्पादन से एकाधिकार समाप्त हो जाता है तब उन्ही फॉर्मूले और सॉल्ट से जैनेरिक दवाईयों बनाई जाती हैं। इनकी गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं होता है। इनकी पैकेजिंग ब्रांडिंग और मार्केटिंग में अंतर होता है।
- दवाईयां पेटेंट की अवधि समाप्त होने के बाद उसी सॉल्ट से बनी जाती हैं जिस सॉल्ट से ब्रांडेड दवाओं बनाई जाती हैं। जैनिरिक दवाओं के निर्माण में मनुष्यो और जानवरों पर बार -बार टेस्ट नहीं करने पड़ते, क्योंकि सभी टेस्ट निर्माताओं द्वारा पहले ही किए जा चुके होते हैं।केवल नई रीसर्च को छोड़कर।
- इनकी मार्केटिंग में कोई खर्चा नहीं किया जाता है। जेनरिक दवाईयां बिना किसी प्रमोशन के साधारण तरीके से बेंची जाती हैं। साथ ही इनकी विशिष्ट पैकेजिंग नहीं की जाती है इस लिए जैनिरिक दवाईयां सस्ती मिलती हैं।
- ब्रांडेड और जैनिरिक दवाईयो की कीमत में अंतर जानने के लिए एक मोबाइल एप " समाधान और हेल्थकार्ट" भी बाजार में उपलब्ध है।
- जैनिरिक दवा जिस सॉल्ट या फ़ोरमूले से बनी होती है उसे उसी का नाम दिया जाता है जैसे बुखार में दी जाने वाली पैरासिटामोल सॉल्ट को कोई कंपनी इसी नाम से बेचती है तो इसे जैनिरिक दवा होगी वहीं इसे किसी ब्रांड या कम्पनी के नाम जैसे क्रोसीन के नाम से बेचा जाता है तो इसे ब्रांडेड दवा कहा जायेगा। सभी सरकारी अस्पतालों में जैनरिक दवाईयां ही दी जाती हैं।
दवा खरीदते समय कैसे पता करें की Generic दवा है या branded ?
कृपया ध्यान दें कि ये तरीके अक्सर काम करते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह संभव हो सकता है
दवा खरीदते समय जब आप दवा की विभिन्न विकप्रियता के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप कुछ निम्नलिखित तरीकों का उपयोग कर सकते हैं:
1. विधान स्थान: कुछ दवाओं के लिए, दवा पैकेज पर एक चिह्न मौजूद हो सकता है जो विभिन्न कंपनियों या विनिर्माताओं की पहचान करता है। ब्रांडेड दवा अक्सर अपनी खुद की पहचान के साथ एक चिह्न के साथ आते हैं। दूसरी ओर, जेनेरिक दवाओं की पैकेजिंग पर उनके विनिर्माता के नाम के अलावा कोई विशेष चिह्न नहीं होता है।
2. सामग्री का नाम या जनकारी: दवा की पैकेजिंग पर पहले पूछे गए साधारण नाम या सामग्री का होना एक इंडिकेशन हो सकती है कि यह एक जेनेरिक दवा है। ब्रांडेड दवा आमतौर पर अपने खुद के विशेष नाम के साथ आते हैं।
3. मूल्य: जेनेरिक दवाएं अक्सर ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले काफी सस्ती होती हैं। यदि एक दवा की कीमत बहुत कम है, तो इसका मतलब हो सकता है कि यह एक जेनेरिक दवा है।
4. डॉक्टर या फार्मासिस्ट से परामर्श लें: आप दवा की जनकारी के बारे में सुनिश्चित होने के लिए स्थानीय डॉक्टर या फार्मासिस्ट से परामर्श ले सकते हैं। वे आपको सही रूप से दवा चुनने में मदद करेंगे और आपको बेहतर विकल्पों के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे।
कृपया ध्यान दें कि ये तरीके अक्सर काम करते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह संभव हो सकता है कि जेनेरिक दवा और ब्रांडेड दवा की पहचान करना थोड़ा मुश्किल हो। इसलिए, ऐसे मामलों में, विशेषज्ञ सलाह लेना सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
डॉक्टर गहनता से हर रोगी का मामला देखते हैं और दवाओं को उनकी अनुकूलता, उपयोगिता और पीछे ले जाने वाली चीजों के आधार पर चयन करते हैं। जेनेरिक दवाएं अतिरिक्त कॉपी होती हैं जो पहले से विकसित और अप्रूव्ड हो चुकी होती हैं। ये उसी तरह काम करती हैं जैसे की ब्रांडेड दवाएं करती हैं, लेकिन उनकी दर काफी कम होती है तथा अधिक कंट्रोल नहीं होता।
डॉक्टर कई अलग-अलग कारणों से जेनेरिक दवाओं के प्रयोग को तर्जीही नहीं देते हैं, जैसे दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा की पुष्टि करने के लिए प्राथमिक अनुशंसाएं कम होती हैं, विशेष प्रकाशनों या साक्षात्कारों में जेनेरिक दवाओं की जानकारी की कमी होती है या डॉक्टर को संभावित अनुचित परिणामों के बारे में चिंता होती है।
इसके अलावा, कुछ रोगी जेनेरिक दवाओं को सही रूप से धारण नहीं कर पाते हैं, जैसे की वे उनकी टेस्ट, रंग, आकार आदि को नोट करके सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाते हैं
डॉक्टर्स क्यों नहीं लिखते जेनेरिक दवाएं ?
डॉक्टर गहनता से हर रोगी का मामला देखते हैं और दवाओं को उनकी अनुकूलता, उपयोगिता और पीछे ले जाने वाली चीजों के आधार पर चयन करते हैं। जेनेरिक दवाएं अतिरिक्त कॉपी होती हैं जो पहले से विकसित और अप्रूव्ड हो चुकी होती हैं। ये उसी तरह काम करती हैं जैसे की ब्रांडेड दवाएं करती हैं, लेकिन उनकी दर काफी कम होती है तथा अधिक रेस्ट रिस्ट्रिक्टेड कंट्रोल
नहीं होता।
डॉक्टर कई अलग-अलग कारणों से जेनेरिक दवाओं के प्रयोग को तरजीह ही नहीं देते हैं, जैसे दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा की पुष्टि करने के लिए प्राथमिक अनुशंसाएं कम होती हैं, विशेष प्रकाशनों या साक्षात्कारों में जेनेरिक दवाओं की जानकारी की कमी होती है या डॉक्टर को संभावित अनुचित परिणामों के बारे में चिंता होती है।
इसके अलावा, कुछ रोगी जेनेरिक दवाओं को सही रूप से धारण नहीं कर पाते हैं, जैसे की वे उनकी टेस्ट, रंग, आकार आदि को नोट करके सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाते हैं।
सुनने में तो ये भी आया है की डॉक्टर generic medicine इसलिए नही लिखते क्योंकि इसमें उन्हें कुछ एक्सट्रा commition नही मिल पाता और ब्रांडेड दवा लिखने से कंपनी द्वारा मोटा कमीशन मिलता है |
Friends, आशा करते है है की आपको इस आर्टिकल से आपको generic और brandid मैडिसन के बारे में उचित ज्ञान मिल गया होगा , लेकिन इस आर्टिकल को लिखने के लिए हमने न्यूज पेपर, अन्य पत्र पत्रिकाओं, और सोशल मीडिया से सामग्री को पढ़कर लिखा है। हो सकता है इसमें कोई त्रुटि हो गई हो। क्योंकि ये एक प्राइवेट वेबसाइट है।
इसके बारे में आपको और अधिक जानकारी लेनी हो तो किसी और और आर्टिकल को अच्छे से जांच लें।
Fast Asking Question (FAQ)
Q. भारत की सबसे बड़ी जेनेरिक कम्पनी क़ौन सी है?
Ans. सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी है और दुनिया की छठी सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माता कंपनी है। यह दुनिया भर के 100 से ज़्यादा देशों में दवाइयों के फॉर्मूलेशन और सक्रिय दवा सामग्री का उत्पादन और बिक्री करती है।
Q. पैटेंट और जेनेरिक दवाओं में क्या अंतर है?
Ans. एक ही कंपनी की पेटेंट और जेनेरिक दवाओं के मूल्य में काफी अंतर होता है। क्योंकि जेनेरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, अत: वे सस्ती होती हैं, जबकि पेटेंट दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं, इसलिए वे महंगी होती हैं।
Q. क्या जन औषधीय दुकानों में जेनेरिक दवाएँ मिलती है?
Ans. उपलब्ध दवाइयां बहुत कम कीमत पर मिलती हैं। इन दवाओं की क्षमता खुले बाजार में महंगी ब्रांडेड दवाओं के बराबर होती है।
Q. जेनेरिक दवा और branded दवा में क्या अंतर है?
Ans.जेनेरिक दवा उस सॉल्ट के नाम से जानी जाती है, जिससे वह बनी होती है। उदाहरण के लिए, जब कोई कंपनी दर्द और बुखार के लिए पैरासिटामोल सॉल्ट को इसी नाम से बेचती है, तो उसे जेनेरिक दवा कहा जाता है। वहीं, जब इसे किसी ब्रांड (जैसे- क्रोसिन) के नाम से बेचा जाता है, तो यह उस कंपनी की ब्रांडेड दवा कहलाती है।
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